UP में SIR के बाद बड़ा बदलाव, 2.89 करोड़ नाम कटेंगे
SIR In Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची को दुरुस्त और त्रुटिरहित बनाने के लिए चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन – SIR) प्रक्रिया अब समाप्त हो चुकी है। 4 नवंबर से शुरू हुई यह प्रक्रिया 26 दिसंबर को खत्म हुई, जिसके बाद सामने आए आंकड़े चौंकाने वाले हैं।

चुनाव आयोग के अनुसार प्रदेश की कुल 15.44 करोड़ मतदाता संख्या में से करीब 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने तय हैं। इसका सबसे ज्यादा असर शहरी इलाकों और बड़े शहरों में देखने को मिला है, जहां पलायन, डुप्लीकेट और अनुपस्थित मतदाताओं की संख्या अधिक पाई गई।
बड़े शहरों में सबसे ज्यादा नाम कटे
SIR के दौरान सामने आए आंकड़ों से स्पष्ट है कि शहरी क्षेत्रों में मतदाता सूची में सबसे ज्यादा गड़बड़ियां थीं। राजधानी लखनऊ इस सूची में सबसे ऊपर रहा, जहां रिकॉर्ड 12 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम काटे गए। इसके बाद प्रयागराज में 11 लाख 56 हजार से ज्यादा, कानपुर में 9 लाख से अधिक और आगरा में 8 लाख 36 हजार से ज्यादा नाम हटाए गए। गाजियाबाद, बरेली, मेरठ, जौनपुर, वाराणसी और गोरखपुर जैसे जिलों में भी लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि इन शहरों में तेजी से बढ़ता शहरीकरण, नौकरी और शिक्षा के लिए पलायन तथा एक ही व्यक्ति का कई जगह नाम दर्ज होना इसकी बड़ी वजह है। राजधानी लखनऊ में जहां पहले करीब 40 लाख मतदाता दर्ज थे, वहीं अब 12 लाख से अधिक नाम कटने से तस्वीर पूरी तरह बदल गई है।
नाम कटने की प्रमुख वजहें
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR के दौरान नाम कटने के पीछे कई ठोस कारण सामने आए हैं। इनमें सबसे बड़ी श्रेणी स्थानांतरित (ट्रांसफर या पलायन) मतदाताओं की है, जिनकी संख्या 1.26 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। इसके अलावा लंबे समय से अनुपस्थित पाए गए मतदाता करीब 83–84 लाख हैं।

मृत मतदाताओं की संख्या भी कम नहीं है। आयोग के आंकड़ों के मुताबिक करीब 46 लाख ऐसे नाम सूची में थे, जिनका निधन हो चुका है लेकिन उनका नाम अब तक हटाया नहीं गया था। वहीं 23–24 लाख नाम डुप्लीकेट पाए गए, यानी एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज था। इन सभी कारणों ने मिलकर मतदाता सूची को अनावश्यक रूप से फुला दिया था, जिसे अब साफ किया जा रहा है।
नोएडा और गौतम बुद्ध नगर की स्थिति
गौतम बुद्ध नगर, खासकर नोएडा, SIR प्रक्रिया में खास चर्चा का विषय रहा। जिले में कुल 18 लाख 65 हजार से ज्यादा मतदाता दर्ज हैं। इनमें से बड़ी संख्या का डिजिटलीकरण और मैपिंग किया गया, लेकिन इसके बावजूद लाखों मतदाता “नो मैपिंग” और ASD (Absent, Shifted, Duplicate) श्रेणी में पाए गए।
नोएडा विधानसभा क्षेत्र में करीब 7.71 लाख मतदाता हैं, जिनमें से लगभग 73 फीसदी का डिजिटलीकरण हो चुका है। दादरी और जेवर सीटों पर भी यही स्थिति रही। पूरे जिले में लगभग 9.81 फीसदी मतदाता ऐसे पाए गए, जिनकी मैपिंग नहीं हो सकी। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि ऐसे 1.80 लाख से अधिक मतदाताओं को नोटिस भेजे जाएंगे और उनसे अपनी पात्रता से जुड़े दस्तावेज मांगे जाएंगे।
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इसके अलावा जिले में करीब 24 फीसदी मतदाता ASD श्रेणी में दर्ज हुए हैं। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार SIR प्रक्रिया के तहत गौतम बुद्ध नगर में करीब 4.40 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, जो समय पर दस्तावेज जमा करने पर ही दोबारा जोड़े जा सकेंगे।
आगे की प्रक्रिया और अहम तारीखें
चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया के बाद की पूरी समय-सीमा भी तय कर दी है। आयोग के मुताबिक 31 दिसंबर को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की जाएगी। इसके बाद जिन मतदाताओं के नाम हटे हैं या जिन्हें सूची में किसी तरह की गलती लगती है, वे 30 जनवरी 2026 तक दावा और आपत्ति दर्ज करा सकते हैं।

इस दौरान जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड नहीं मिला है या जिनका नाम काटा गया है, उन्हें संबंधित BLO के पास जरूरी दस्तावेज जमा करने होंगे। आयोग ने 13 तरह के मान्य दस्तावेज तय किए हैं, जिनमें से कोई एक जमा करके मतदाता अपना नाम दोबारा सूची में शामिल करा सकता है। सभी दावों और आपत्तियों के निपटारे के बाद फरवरी 2026 में अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी।
चुनाव आयोग की अपील
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मतदाताओं से अपील की है कि वे अपनी स्थिति जरूर जांच लें। अगर किसी का नाम कट गया है तो घबराने की जरूरत नहीं है। समय सीमा के भीतर फॉर्म-6 भरकर और जरूरी दस्तावेज जमा करके नाम दोबारा जोड़ा जा सकता है। आयोग का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया का मकसद किसी को वोट देने से वंचित करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को स्वच्छ, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना है।

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लोकतंत्र के लिए क्यों जरूरी है SIR
विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाएं लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद जरूरी मानी जाती हैं। गलत, फर्जी या डुप्लीकेट नामों की वजह से चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। SIR के जरिए न सिर्फ मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटते हैं, बल्कि वास्तविक और पात्र मतदाताओं को सही पहचान मिलती है।
हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर नाम कटने से आम लोगों में चिंता भी स्वाभाविक है। खासकर शहरी इलाकों में रहने वाले वे लोग जो अक्सर पता बदलते रहते हैं, उन्हें समय रहते अपनी जानकारी अपडेट करनी होगी। कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में SIR के नतीजे यह दिखाते हैं कि मतदाता सूची में लंबे समय से सुधार की जरूरत थी। अब यह जिम्मेदारी मतदाताओं की भी है कि वे तय समय सीमा में अपने दस्तावेज जमा कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
