श्रीराम जन्मभूमि के रक्षक: 700 मुगलों को मारने वाला ब्राह्मण का इतिहास
पंडित देवीदीन पाण्डेय: श्रीराम मंदिर रक्षक पंडित देवीदीन पाण्डेय 700 मुगलों को मारने वाला ब्राह्मण योद्धा जो शास्त्र के साथ शस्त्र उठाना भी जानता था। उसकी वीरगाथा के बारे में जानेंगे, श्रीराम जन्मभूमि की रक्षा में बलिदान देने वाले भूले-बिसरे नायक…
भारतीय इतिहास केवल राजाओं और सल्तनतों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य गुमनाम योद्धाओं की गाथा भी है जिन्होंने धर्म, संस्कृति और आस्था की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। ऐसे ही एक महान, परंतु इतिहास के पन्नों में लगभग विस्मृत, योद्धा थे पंडित देवीदीन पाण्डेय—एक ब्राह्मण, एक पुरोहित, लेकिन उससे भी बढ़कर श्रीराम जन्मभूमि के रक्षक। पंडित देवीदीन पाण्डेय का नाम आते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्राह्मण केवल शास्त्रों का ज्ञाता ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर शस्त्र उठाकर धर्म की रक्षा करने वाला योद्धा भी हो सकता है।

सनेथू गांव का सूर्यवंशी पुरोहित
पंडित देवीदीन पाण्डेय का जन्म अयोध्या से लगभग छह मील दूर सनेथू गांव में एक सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह परिवार सूर्यवंशी क्षत्रियों का कुल-पुरोहित रहा था। देवीदीन पाण्डेय कर्मकांडी पुरोहित थे—यज्ञ, अनुष्ठान, वेद-पाठ और शास्त्रार्थ में पारंगत।
लेकिन उनकी शिक्षा केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं थी। परिवार ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को देखते हुए उन्हें शस्त्र विद्या सीखने से नहीं रोका। वे मलखंभ, कुश्ती, भाला, तलवार और युद्ध कौशल में भी निपुण थे। आसपास के गांवों में उनकी विद्वत्ता और वीरता की चर्चा समान रूप से होती थी।
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जब धर्म संकट में पड़ा तब…
सन् 1528 ई. का समय। बाबर के वजीर मीर बांकी के नेतृत्व में मुगल सेना अयोध्या की ओर बढ़ रही थी। लक्ष्य स्पष्ट था—श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त करना। जब यह समाचार सनेथू गांव पहुँचा, तो देवीदीन पाण्डेय व्याकुल हो उठे।
उनका मानना था कि “धर्म की रक्षा केवल प्रवचनों से नहीं, आवश्यकता पड़ने पर युद्ध से भी करनी चाहिए।” उन्होंने पुरोहित का कार्य त्याग दिया और आसपास के ब्राह्मणों, क्षत्रियों और ग्रामीणों को एकत्र करना शुरू किया। देखते-ही-देखते 70,000 से 90,000 तक रामभक्त युद्ध के लिए तैयार हो गए।

युद्ध का उद्घोष: हर-हर महादेव
जैसे ही देवीदीन पाण्डेय युद्ध के लिए आगे बढ़े, सूर्यवंशी क्षत्रियों ने अपने पुरोहित का साथ देना अपना धर्म समझा। “हर-हर महादेव” और “जय श्रीराम” के नारों से अयोध्या की धरती गूंज उठी। मुगल सेना अत्याधुनिक हथियारों और हाथियों से लैस थी, जबकि हिंदू सेना आस्था, साहस और बलिदान के भाव से प्रेरित थी। युद्ध इतना भीषण था कि इतिहासकार कनिंघम के अनुसार 1,74,000 हिंदुओं के शव धरती पर गिरे।
अकेले 700 मुगलों का संहार
आपको जानकर हैरानी होगी कि युद्ध के दौरान पंडित देवीदीन पाण्डेय स्वयं मुगल सैनिकों के बीच जा घुसे। कहा जाता है कि उन्होंने अपने हाथों से 700 मुगल सैनिकों को मार गिराया। यह उल्लेख स्वयं तुजुके बाबरी में मिलता है, जहाँ बाबर लिखता है— “अकेले देवीदीन ने सात सौ मुगल सैनिकों को मार डाला।”

मुगल सैनिकों ने उन पर लखौरी ईंटों की वर्षा कर दी। एक वार में उनकी खोपड़ी फट गई, रक्त की धार बहने लगी। लेकिन उन्होंने अपने गमछे या पगड़ी से सिर बांधा और पुनः युद्ध में कूद पड़े।
मीर बांकी पर प्रहार और वीरगति
देवीदीन पाण्डेय ने मीर बांकी पर भाले से प्रहार किया। मीर बांकी हाथी के हौदे में छिपकर बच गया, लेकिन उसका महावत मारा गया और हाथी घायल हो गया। अंततः मीर बांकी ने बंदूक से देवीदीन पाण्डेय पर गोली चला दी। गंभीर रूप से घायल देवीदीन पाण्डेय ने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की। वे गिर पड़े, लेकिन उनके बलिदान ने इतिहास की धारा को बदल दिया।
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संघर्ष यहीं नहीं रुका
देवीदीन पाण्डेय से पहले भीटी के महाराजा महताब सिंह और हसबर के राजा रणविजय सिंह शहीद हो चुके थे। उनके बाद महताब सिंह की 20 वर्षीय पुत्री राजकुमारी जयराज तीन हजार सैनिकों के साथ युद्ध में कूद पड़ीं। उनके गुरु संन्यासी स्वामी महेश्वरानंद गांव-गांव जाकर अलख जगा रहे थे। यह संघर्ष बाबरी ढांचे के निर्माण के बाद भी रुका नहीं। अकबर के समय हिंदुओं ने बाबरी ढांचे की चारदीवारी गिराकर बीच में चबूतरा बनाया और वहां भगवान श्रीराम की मूर्ति स्थापित की।

अकबर से औरंगजेब तक
अकबर के समय पूजा-पाठ पर रोक नहीं लगी, लेकिन उसके बाद जहांगीर और शाहजहां के काल में स्थिति बदलने लगी। औरंगजेब के समय मंदिरों को तोड़ने का संगठित अभियान चला। अयोध्या, काशी और मथुरा विशेष निशाने पर रहीं। इसके बावजूद रामभक्तों का संघर्ष कभी समाप्त नहीं हुआ।
इतिहास में क्यों दबा दिया गया नाम?
पंडित देवीदीन पाण्डेय जैसे ब्राह्मण योद्धाओं को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे। स्वतंत्र भारत के कई इतिहासकारों ने इस संघर्ष को या तो नजर अंदाज किया या जानबूझकर दबा दिया।
लखनऊ गजेटियर में कनिंघम लिखते हैं— “1,74,000 हिंदुओं की लाशें गिरने के बाद मीर बांकी राम मंदिर ध्वस्त करने में सफल हुआ।” लेकिन इन पंक्तियों के पीछे छिपे बलिदान और वीरता की कहानियाँ पाठ्य-पुस्तकों से गायब कर दी गईं।

सनेथू गांव की मौन प्रतिज्ञा
कहते हैं कि सनेथू गांव के लोगों ने राम मंदिर न बचा पाने के शोक में पगड़ी, छाता और जूता-चप्पल त्याग दिए। यह मौन प्रतिज्ञा सदियों तक चली। आज जब श्रीराम मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ है, तो यह गांव भी अपने बलिदान पर गर्व कर सकता है।
एक भूला हुआ, लेकिन अमर नायक
पंडित देवीदीन पाण्डेय केवल एक व्यक्ति नहीं थे—वे एक विचार थे। वह विचार कि धर्म की रक्षा के लिए यदि प्राण भी देने पड़ें, तो पीछे नहीं हटना चाहिए। आज जब श्रीराम जन्मभूमि का इतिहास लिखा जा रहा है, तो यह आवश्यक है कि ऐसे वीर ब्राह्मण योद्धाओं को भी स्मरण किया जाए, जिन्होंने इतिहास को अपने रक्त से सींचा। ऐसे धर्मरक्षक, रामभक्त और वीर योद्धा को शत-शत नमन।
