उत्तर प्रदेश

माघ मेला 2026: शंकराचार्य–प्रशासन टकराव, धरने पर संत, सियासत गरम

Prayagraj Magh Mela 2026: प्रयागराज में चल रहे माघ मेला 2026 के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच हुआ टकराव अब एक बड़े धार्मिक-राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। संगम नोज पर स्नान को लेकर उत्पन्न हुए इस विवाद में न सिर्फ पुलिस और संतों के अनुयायियों के बीच झड़प हुई, बल्कि इसके बाद धरना, आरोप-प्रत्यारोप और सियासी बयानबाज़ी भी तेज हो गई है।

संगम स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद

पूरा मामला तब शुरू हुआ जब ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने लगभग 200 अनुयायियों के साथ रथ/पालकी पर सवार होकर संगम नोज पर मौनी अमावस्या स्नान के लिए निकले। प्रशासन का कहना था कि संगम क्षेत्र में अत्यधिक भीड़ होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनज़र किसी भी साधु-संत को पालकी या रथ से जाने की अनुमति नहीं है और सभी को पैदल ही स्नान के लिए जाना होगा।

प्रशासन के अनुसार, शंकराचार्य ने इसके लिए कोई पूर्व अनुमति भी नहीं ली थी। वहीं शंकराचार्य का कहना है कि पिछले 39 वर्षों से वह इसी गरिमा और परंपरा के अनुसार संगम स्नान करते आ रहे हैं और शंकराचार्य पद की मर्यादा के अनुरूप पालकी पर जाना उनका अधिकार है।

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पुलिस और अनुयायियों के बीच झड़प

स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब पुलिस ने सुरक्षा बैरिकेडिंग लगाकर आगे बढ़ने से रोका। आरोप है कि शंकराचार्य के कुछ अनुयायियों ने बैरियर तोड़ने की कोशिश की, जिससे पुलिस और साधुओं के बीच धक्का-मुक्की और हाथापाई हो गई। इस दौरान कई साधुओं को पुलिस द्वारा हटाए जाने और कुछ को हिरासत में लेने की भी बात सामने आई।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, शंकराचार्य का रथ सादी वर्दी में मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा खींचकर संगम नोज से करीब एक किलोमीटर दूर छोड़ दिया गया, जिसे उनके समर्थकों ने “अपमानजनक कृत्य” बताया।

धरने पर बैठे शंकराचार्य

घटना के बाद नाराज़ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए। उन्होंने साफ कहा कि जब तक प्रशासन उन्हें पूरे सम्मान और तय प्रोटोकॉल के तहत संगम तक नहीं ले जाता, तब तक वे गंगा स्नान नहीं करेंगे। शंकराचार्य ने प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके और उनके अनुयायियों के साथ अभद्र व्यवहार किया गया है, जो किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

कंप्यूटर बाबा का समर्थन

इस विवाद में शंकराचार्य को कंप्यूटर बाबा का खुला समर्थन मिला। कंप्यूटर बाबा धरना स्थल पर जमीन पर लेटकर धरना देते नजर आए। उन्होंने कहा- “ आज देश में संतों, शंकराचार्यों और सनातन का अपमान हो रहा है। माघ के पवित्र महीने में प्रयागराज में संतों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाना बेहद दुखद है। जो सरकार खुद को सनातनी कहती है, उसी सरकार के राज में संतों का अपमान हो रहा है।” उन्होंने जनता से अपील करते हुए कहा- ऐसी सरकार का विरोध किया जाना चाहिए जो संतों और धर्माचार्यों का अनादर कर रही है।

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विपक्ष का हमला, संजय सिंह का बयान

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने भी इस मामले को लेकर योगी सरकार और यूपी पुलिस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा – “यह सिर्फ एक संत को रोकने की घटना नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक और धार्मिक मर्यादाओं को रौंदने का मामला है। शंकराचार्य जैसे विश्वविख्यात धर्माचार्य के साथ ऐसा व्यवहार सत्ता के अहंकार को दर्शाता है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि यूपी पुलिस अब संविधान से नहीं, बल्कि राजनीतिक आदेशों से संचालित हो रही है और असहमति की हर आवाज़ को कानून-व्यवस्था का नाम देकर दबाया जा रहा है।

प्रशासन का पक्ष

प्रयागराज की मंडल आयुक्त सौम्या अग्रवाल, पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार और जिलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा ने स्पष्ट किया कि माघ मेले में किसी भी साधु-संत को पालकी या रथ से संगम तक जाने की अनुमति नहीं है। यह नियम सभी के लिए समान है।

प्रशासन का कहना है कि मौनी अमावस्या के दिन संगम क्षेत्र में करोड़ों श्रद्धालु मौजूद थे और सुरक्षा में किसी भी तरह की चूक भगदड़ जैसी बड़ी घटना को जन्म दे सकती थी। पुलिस कमिश्नर ने बताया कि पूरे क्षेत्र में 452 सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और फुटेज के आधार पर बैरिकेडिंग तोड़ने व अव्यवस्था फैलाने वालों पर FIR दर्ज की जाएगी।

करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था

प्रशासन के मुताबिक, मौनी अमावस्या के दिन दोपहर 12 बजे तक 3.15 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में आस्था की डुबकी लगाई, जबकि रात तक यह संख्या 4 से 5 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। मेला क्षेत्र को नो-व्हीकल जोन घोषित किया गया है और AI तकनीक व पैरामिलिट्री फोर्स की मदद से सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई है।

बढ़ता विवाद, गहराता सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर धार्मिक परंपराओं और संतों की गरिमा से समझौता किया जा सकता है? वहीं दूसरी ओर प्रशासन का तर्क है कि इतने बड़े आयोजन में नियमों का उल्लंघन किसी के लिए भी स्वीकार्य नहीं हो सकता, चाहे वह कितना ही बड़ा धर्माचार्य क्यों न हो।

फिलहाल शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने धरने पर अडिग हैं और प्रशासन कार्रवाई की बात कर रहा है। ऐसे में माघ मेला 2026 का यह विवाद आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, जिसका असर धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर साफ दिखाई दे रहा है।

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