रील्स देखने से होता साइकोलॉजिकल इफेक्ट
Lifestyle: रील्स देखने का दिमाग पर क्या असर पड़ता है? आइये इसके बारे में जानते है क्योंकि सोशल मीडिया रील्स देखने का असर आपके दिमाग पर सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी…यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितनी देर, किस प्रकार का कंटेंट और किस आदत के साथ उन्हें देखते हैं।
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रील्स देखने के नकारात्मक प्रभाव

ध्यान देने की क्षमता कम होना (Attention Span घटता है), जैसा कि आप सभी जानते है रील्स 5–30 सेकंड की होती हैं, इसलिए दिमाग हर समय तेज़-तेज़ डोपामाइन मांगने लगता है। इसका असर किसी चीज़ पर लंबे समय तक ध्यान लगाने में कठिनाई, पढ़ाई, काम या बातचीत में फोकस टूटना इस तरह से पड़ता है।
डोपामाइन ओवरलोड- हर नई रील दिमाग में डोपामाइन रिलीज करती है। अधिक रील्स = अधिक डोपामाइन = दिमाग को और तेज उत्तेजना चाहिए। जिसका परिणाम: छोटी-छोटी चीज़ों में खुशी नहीं मिलना, चिड़चिड़ापन बढ़ना, लगातार रील्स देखने की लत लगना।
तुलना और असंतोष बढ़ना क्योंकि रील्स में लोग दिखते हैं: खूबसूरत, अमीर, परफेक्ट लाइफ वाले इससे आप अनजाने में खुद को उनसे तुलना करने लगते हैं। जिसका परिणाम: आत्मविश्वास कम होना, असंतोष बढ़ना, शरीर या चेहरे को लेकर हीन भावना होना।

नींद पर बुरा असर होता है, सोने से पहले रील्स देखने से स्क्रीन की लाइट और तेज कंटेंट दिमाग को जागा हुआ रखता है। जिसका नतीजा: नींद देर से आती है, नींद गहरी नहीं होती, सुबह थकान रहती है।
पढ़ाई और काम में गिरावट होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि रील्स का माइंड पर तेज़ असर ब्रेन को हाइपर-स्टिमुलेट कर देता है, जिससे: पढ़ाई में रुचि कम, काम की गुणवत्ता खराब, आलस बढ़ना, टालमटोल (Procrastination) की आदत होना।
दिमाग में लगातार कंटेंट घूमना क्योंकि बहुत रील्स देखने के बाद दिमाग में वही म्यूजिक, डायलॉग और क्लिप बार-बार चलने लगते हैं। इसे “स्टिकी ब्रेन” कहा जाता है।
रील्स के सकारात्मक प्रभाव
- मन हल्का होता है, थोड़ा मनोरंजन दिमाग को रिलैक्स देता है।
- नई जानकारी मिल सकती है, अगर आप सीखने वाले रील्स देखें तो कुकिंग, फैशन, मोटिवेशन, न्यूज़, शिक्षा तो वे फायदेमंद भी साबित होते हैं।
- क्रिएटिव सोच बढ़ती है, अच्छा कंटेंट देखने से आपका अपना रचनात्मक दिमाग भी सक्रिय होता है।

रील्स देखने का असर कैसे कम करें?
- छोटे लेकिन असरदार उपाय
- दिन में केवल 15–20 मिनट सीमित समय देखें।
- सोने से 1 घंटा पहले रील्स बिल्कुल न देखें।
- सिर्फ सीखने और उपयोगी कंटेंट फॉलो करें।
- फोन को दूर रखकर 2-3 घंटे डिजिटल ब्रेक लें।
- यदि रील्स दिमाग में घूमती रहें, धीरे-धीरे रील समय कम करें।
डूम स्क्रॉलिंग: रील्स खोलते ही दिमाग को लगातार नया, तेज़ और रंगीन कॉन्टेंट मिलता है। कुछ ही मिनटों में सैकड़ों वीडियो देखने की इस आदत को ही डूम स्क्रॉलिंग कहा जाता है। लेकिन अब इसे सिर्फ “टाइम पास” नहीं माना जाता, दिमाग की फोकस और प्रोसेसिंग क्षमता पर असर डालने वाला व्यवहार माना जा रहा है।
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लेकिन अच्छी बात यह है कि दिमाग बेहद एडप्टेबल है। थोड़ा-थोड़ा स्क्रीन टाइम कम करने, सोने से पहले मोबाइल दूर रखने, नोटिफिकेशन ऑफ करने और ऑफलाइन एक्टिविटीज बढ़ाने से दिमाग धीरे-धीरे वापस बैलेंस में आने लगता है। रील्स बुरी नहीं हैं बस उनकी बाउंड्री तय करना ज़रूरी है। आपका दिमाग तेज़ भी रहेगा और शांत भी।

क्या होता है ‘ब्रेन रॉट’?
Gen-Z स्लैंग में ब्रेन रॉट = ध्यान भटकना + सोचने की क्षमता कम + दिमाग का थक जाना। बार-बार रील्स देखने से ये पैटर्न बढ़ता है।
दिमाग कैसे बदलता है?
71 स्टडीज़ की रिपोर्ट: शॉर्ट वीडियो का ओवरयूज़ = फोकस और सेल्फ-कंट्रोल में कमी । स्ट्रेस और एंग्जायटी भी बढ़ सकती है।
ग्रे मैटर पर असर-
Neurolmage की स्टडी: लगातार रील्स देखने से दिमाग का ग्रे मैटर भी प्रभावित हो सकता है। धीमा प्रोसेसिंग, ईर्ष्या, और इंपल्सिव फैसले ।
