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RSS शताब्दी समारोह: शिक्षा और समाज पर मोहन भागवत ने दिया दिशा-विचार

Centenary celebrations of RSS: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष ‘100′ के मौके पर आयोजित तीन दिवसीय समारोह के खास मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत नई पीढ़ी को तैयार करने को लेकर कई अहम जानकारी साथ ही और भी कई विषयों पर विस्तृत जानकारी दी हैं।

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RSS को लेकर मोहन भागवत ने किया स्पष्ट

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RSS के शताब्दी वर्ष ‘100′ के मौके डॉ. मोहन भागवत ने संघ को लेकर कहा- संघ का निर्माण भारत को केंद्र में रखकर हुआ है और इसकी सार्थकता भारत के विश्वगुरु बनने में है। साथ ही संघ का मानना ​​है कि एकजुट होने के लिए हमें एकरूपता की आवश्यकता नहीं है। हमारी संस्कृति सद्भावनापूर्वक साथ रहने की है।

वहीं आपको बतादें कि संघ को चलाने के लिए संघ किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता। स्वयंसेवकों की तपस्या और निष्ठा और समपर्ण के आधार पर संघ स्वावलंबी है। संघ प्रमुख भागवत ने आगे कहा- हमारे राष्ट्र को एक बार फिर महान बनाने का एकमात्र तरीका हमारे समाज का गुणात्मक विकास और हमारे राष्ट्र की प्रगति में पूरे समाज की भागीदारी है।

मोहन भागवत ने आगे कहा- संघ के बारे में बहुत सारी चर्चाएँ चलती हैं। ध्यान में आया कि जानकारी कम है। जो जानकारी है, वह ऑथेंटिक कम है। इसलिए अपनी तरफ से संघ की सत्य और सही जानकारी देना चाहिए। संघ पर जो भी चर्चा हो, वह परसेप्शन पर नहीं बल्कि फैक्ट्स पर हो। “

संघ प्रमुख मोहन भागवत का समाज के लिए RSS का विचार

1925 के विजयदशमी के बाद डॉक्टर साहब ने घोषणा कि आज यह संघ हम प्रारंभ करेंगे। तो उन्होंने कहा संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन। पहली बात ये है कि जिनको हम हिंदू समाज कहते है और जिसे हिंदू नाम लगाना है उसको देश के प्रति जिम्मेदार रहना होगा ।”- पूजनीय सरसंघचालक

शुद्ध सात्त्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है, यही संघ है।”- डॉ. मोहन भागवत

संघ के स्वयंसेवक प्रभावित लोगों के धर्म की परवाह किए बिना सेवा कार्य करते हैं।- डॉ. मोहन भागवत

किसी स्वयंसेवी संगठन का इतना कड़ा और कटु विरोध नहीं हुआ, जितना संघ का हुआ।”- पूजनीय सरसंघचालक जी

संघ में कोई प्रोत्साहन नहीं है, बल्कि संघ के स्वयंसेवक अपना काम इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें अपने काम में आनंद आता है। उन्हें इस बात से प्रेरणा मिलती है कि उनका काम विश्व कल्याण के लिए समर्पित है। संघ के प्रथम प्रचारकों में से एक, श्री दादाराव परमार्थ जी ने एक पंक्ति में आरएसएस को समझाया था: “आरएसएस हिंदू राष्ट्र के जीवन मिशन का एक विकास है।”

हम रामप्रसाद बिस्मिल से उतने ही प्रेरित हैं जितने अशफाकउल्ला खान से।

  1. समाज के व्यवहार में परिवर्तन व्यक्तिगत परिवर्तन से ही संभव है।
  2. पहले समाज बदले, फिर व्यवस्थाएँ सुधरें।
  3. हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है।

संघ में केवल यही तीन विचार अपरिवर्तनीय हैं।

  • व्यक्ति निर्माण से समाज के आचरण में परिवर्तन संभव है।
  • पहले समाज बदलना पड़ता है, तो व्यवस्था ठीक हो जाती है।
  • हिंदुस्थान हिंदू राष्ट्र है। इन तीन बातों को छोड़कर संघ में सब बदल सकता है।

महिलायें हमारी परस्पर पूरक: राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना 1936 में हुई थी और यह महिलाओं के बीच शाखाएँ चलाती है। संघ और समिति के बीच समानांतर शाखाएँ चलाने का समझौता हुआ है। इसके अलावा, हमारी सभी गतिविधियों में महिलाएँ शामिल हैं क्योंकि हम पूरे समाज को संगठित करना चाहते हैं। संघ में महिलाओं की प्रभावी भूमिका है। केवल दोनों की शाखा अलग लगती है। महिलायें हमारी परस्पर पूरक है। संघ प्रेरित अनेक संगठनों की प्रमुख महिलायें ही हैं।

छात्रों को विद्यालय दे जरूरी जानकारी: संविधान के प्रस्तावना, नागरिक कर्तव्य, नागरिक अधिकार और मार्गदर्शक तत्व – इन चार विषयों की जानकारी विद्यालय के छात्रों को मिलनी चाहिए। स्कूल में छात्रों को संविधान की प्रस्तावना, मौलिक कर्तव्य, मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के बारे में पता होना चाहिए। शिक्षा केवल जानकारी रटना नहीं है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को संस्कारवान और संस्कारवान बनाना है। शिक्षा हमारी परंपराओं और संस्कृति पर आधारित मूल्यों का संचार करे। नई शिक्षा नीति में पंचकोषीय शिक्षा (पाँच-स्तरीय समग्र शिक्षा) का प्रावधान है। तकनीक और आधुनिकता का विरोध ज़रूरी नहीं है। शिक्षा में तकनीक का बुद्धिमानी से उपयोग करना सिखाया जाना चाहिए। मनुष्य को तकनीक का स्वामी होना चाहिए, न कि इसका स्वामी।

भारत की सभी भाषाएँ, राष्ट्रभाषाएँ हैं। एक भारतीय भाषा माननीय राष्ट्रपतियों के लिए व्यवहार के लिए संपर्क। उसे विदेशी ना हो भाषा को लेकर विवाद नहीं करना चाहिए। सभी भारतीय भाषाएँ राष्ट्रीय भाषाएँ हैं। लेकिन हमें एक ऐसी संपर्क भाषा की जरूरत है जो विदेशी न हो। – मोहनजी भागवत

बच्चा तीन होना चाहिए और उससे ज्यादा नहीं होना चाहिए। तीन संत तक की बातचीत होनी चाहिए, उससे अधिक नहीं। किसी सभ्यता को जीवित रखने के लिए 2.1 का उल्लेख किया जाता है, इसका मूल अर्थ तीन बच्चे हैं। लेकिन, संसाधनों का प्रबंधन भी करना है, इसलिए हमें 3 तक ही सीमित रहना चाहिए।

देश के विभाजन को लेकर – आरएसएस ने विभाजन का विरोध नहीं किया इस सवाल का जवाब देते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि यह गलत जानकारी है। संघ ने विभाजन का विरोध किया था, लेकिन उस समय संघ के पास क्या ताकत थी। अखंड भारत एक सच्चाई है। उन्होंने आगे कहा कि भारत के विभाजन को रोकने में संघ की भूमिका को समझना हो तो हो वे शेषाद्रि की पुस्तक ट्रैजिक स्टोरी ऑफ़ पार्टीशन पढ़नी चाहिए।

हिंदू-मुस्लिम एकता पर बोले – संघ प्रमुख ने कहा कि जब सब एक हैं तो हिंदू-मुस्लिम एकता की बात क्यों हो रही है? हम सब भारतीय हैं, फिर एकता का सवाल ही क्यों? बस इबादत के तौर-तरीकों में फर्क है। हिंदू सोच यह नहीं कहती कि इस्लाम यहां नहीं रहेगा। उन्होंने आगे कहा कि पहले दिन इस्लाम जब भारत में आया उस दिन से इस्लाम यहां है और रहेगा। ये मैंने पिछली बार भी कहा था। इस्लाम नहीं रहेगा ये सोचने वाली हिन्दू सोच का नहीं है। हिन्दू सोच ऐसी नहीं है। दोनों जगह ये विश्वास बनेगा तब ये संघर्ष खत्म होगा। पहले ये मानना होगा कि हम सब एक हैं।

जनसंख्या से अधिक, अंतर क्या है यह महत्वपूर्ण है। हमें जनसांख्यिकी के बारे में सोचने की ज़रूरत है क्योंकि जनसांख्यिकी में बदलाव का असर हम पर पड़ता है। यह सिर्फ जनसंख्या के बारे में नहीं है, यह इरादे के बारे में है।” – डॉ. मोहन भागवत

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प्रश्न: क्या संस्कृत को अनिवार्य किया जाना चाहिए?
उत्तर: स्वयं को और अपने ज्ञान, परंपरा को समझने के लिए संस्कृत का बुनियादी ज्ञान आवश्यक है। इसे अनिवार्य बनाने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन, भारत को सही अर्थों में समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन आवश्यक है। यह ललक पैदा करनी होगी।

प्रश्न: तकनीक और आधुनिकीकरण के युग में संस्कार और परम्पराओं के संरक्षण की चुनौती को संघ किस प्रकार देखता है?
उत्तर: तकनीकी और आधुनिकता इनका शिक्षा से विरोध नहीं है। शिक्षा केवल जानकारी नहीं है, मनुष्य सुसंस्कृत बने। नई शिक्षा नीति में पंचकोशीय शिक्षा का प्रावधान है।

संघ के पास आकर संघ को देखिए और समझिए। मैं आपका स्वागत करता हूँ कि आप अंदर आएँ और संघ को समझें। संघ शाखा में जाएँ, हमारे स्वयंसेवकों के घर जाएँ, संघ के कार्यक्रमों में शामिल हों और आप पाएंगे कि मेरे द्वारा साझा किए गए विचार कार्यों के रूप में आकार ले रहे हैं। जब समाज में अविश्वास और द्वेष व्याप्त हो जाता है, तो वह सामूहिक कार्रवाई करने में असमर्थ हो जाता है और सार्थक परिणाम देने में विफल हो जाता है। समाज के सभी वर्गों के बीच परस्पर संवाद और सद्भावना की भावना स्थापित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

संविधान, नियम, कानून का पालन करना। – नागरिक कर्तव्य। हम सभी को संविधान, नियमों और कानून का पालन करना चाहिए। अगर कभी-कभी आप पुलिस/कानून से नाखुश हों, तो विरोध करने के शांतिपूर्ण तरीके भी हैं। उकसावे में आकर अराजकतावादियों के जाल में न फँसें।

आत्मनिर्भरता सब बातों की कुंजी है। अपना देश आत्मनिर्भर होना चाहिए। आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी के उपयोग को प्राथमिकता दें। देश की नीति में स्वेच्छा से अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार होना चाहिए, दबाव में नहीं। यही स्वदेशी है।

सामाजिक समरसता का कार्य कठिन होते हुए भी, करना ही होगा; उसके अलावा कोई उपाय नहीं। अपने आसपास के वंचित वर्ग में मित्रता करना। मंदिर पानी और शमशान में कोई भेद न रहे। इस आधार पर किसी को कोई रोकटोक ना हो।

कुटुंब प्रबोधन : परिवार में बैठकर सोचें कि अपने भारत के लिए हम क्या कर सकते हैं। अपने देश समाज के लिए किसी भी प्रकार से कोई भी कार्य करना। पौधा लगाने से लेकर वंचित वर्ग के बच्चों को पढ़ाने तक का कोई भी छोटा सा कार्य करने से देश और समाज से जुड़ने का मानस बनेगा।

पंच परिवर्तन के लिए स्वयंसेवक आगामी समय में कार्य करेंगे। संघ कार्य के इस अगले चरण में, स्वयंसेवकों ने “पंच परिवर्तन”- समाज को बदलने के लिए पांच कार्य – का कार्य संभाला है।

संस्कारात्मक अनुभव

  • बच्चों को संबंधों और समाज की वास्तविकता का अनुभव कराना।
  • जैसे पेरिस ले जाने के बजाय कारगिल, झुग्गी-बस्तियाँ, या ग्रामीण जीवन दिखाना।

कुटुंब प्रबोधन : परिवार में बैठकर सोचें कि अपने भारत के लिए हम क्या कर सकते हैं। अपने देश समाज के लिए किसी भी प्रकार से कोई भी कार्य करना। पौधा लगाने से लेकर वंचित वर्ग के बच्चों को पढ़ाने तक का कोई भी छोटा सा कार्य करने से देश और समाज से जुड़ने का मानस बनेगा।

“हमें तब तक आगे बढ़ते रहना चाहिए जब तक हम सम्पूर्ण हिंदू समाज को एक करने का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते। और हम यह कैसे कर सकते हैं? इसे चार मार्गदर्शक सिद्धांतों में समाहित किया जा सकता है – मैत्री, करुणा, सहानुभूतिपूर्ण आनंद और समता।” – डॉ. मोहन जी भागवत

  • संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन लक्ष्य है – इसके लिए सतत चलते रहना है।
  • मैत्री , उपेक्षा, आनंद, करूणा आदि प्रकार से संघ उन की स्थिति के अनुसार मनुष्यों को देखता है ।

वैश्विक सन्दर्भ और चेतावनी

  • प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भी तीसरे विश्वयुद्ध जैसी स्थिति आज दिखाई देती है।
  • अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ (League of Nations, UN) स्थायी शांति स्थापित नहीं कर पाईं।
  • समाधान केवल धर्म-संतुलन और भारतीय दृष्टि से संभव है।

संघ का मूल आधार

  • शुद्ध सात्त्विक प्रेम ही संघ है, यही कार्य का आधार है।
  • हिंदुत्व का सार: सत्य और प्रेम।
  • दिखते भिन्न हैं, परन्तु सब एक हैं – दुनिया अपनेपन से चलती है, सौदे से नहीं।
  • मानव संबंध अनुबंध और लेन-देन पर नहीं, बल्कि अपनेपन पर आधारित होने चाहिए।

अवैध घुसपैठ पर बोले संघ प्रमुख- आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि घुसपैठ को रोकना चाहिए। सरकार कुछ प्रयास कर रही है, धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। लेकिन समाज के हाथ में है कि हम अपने देश में रोजगार अपने देश के लोगों को देंगे। अपने देश में भी मुसलमान नागरिक हैं। उन्हें भी रोजगार की जरूरत है। मुसलमान को रोजगार देना है तो उन्हें दीजिए। जो बाहर से आया है उन्हें क्यों दे रहे हो? उनके देश की व्यवस्था उन्हें करनी चाहिए।

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