
जाम, जिस्म और जुबान का शोर : क्या यही है आधुनिक स्त्री का सशक्तिकरण?
- जाम, जिस्म और ज़ुबान का शोर : क्या यही है आधुनिक स्त्री का सशक्तिकरण?
- बोल्डनेस का चश्मा या समानता की लड़ाई : कहाँ भटक गया आज का नारीवाद?
लखनऊ: अमरेन्द्र प्रताप सिंह
आज का दौर महिला अधिकारों और लैंगिक समानता की मुखर वकालत का दौर है, जो एक स्वस्थ समाज के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन इसी वैचारिक प्रगति की आड़ में एक विकृति भी पनप रही है, जिसे समाजशास्त्री ‘स्यूडो-फेमिनिज्म’ (छद्म-नारीवाद) या ‘टॉक्सिक फेमिनिज्म’ कहते हैं। जब आंदोलन का मूल उद्देश्य ‘समानता’ से भटककर ‘पुरुष-द्वेष’ (मिसैंड्री) और केवल दैहिक व सामाजिक दुराग्रहों में तब्दील होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि वैचारिक भटकाव आ चुका है।
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मूल स्त्रीवाद

मूल स्त्रीवाद (Feminism) का संघर्ष सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक व्यवस्था, लैंगिक भेदभाव और असमानता के खिलाफ रहा है। इसका उद्देश्य पुरुषों को नीचा दिखाना कभी नहीं था, बल्कि महिलाओं के लिए समान अवसर, शिक्षा और गरिमा सुनिश्चित करना था। इसके विपरीत, आज सोशल मीडिया के दौर में आधुनिकता की परिभाषा बेहद सतही और सिर्फ ‘देह’ या ‘उन्मुक्त विलासिता’ तक सिमटती दिख रही है।
हाथ में बियर का गिलास थामना, अंग-प्रदर्शन करते कपड़ों में तस्वीरें डालना या दोहरे अर्थों वाली कामुक सूक्तियों व ‘कचौड़ी-समोसे’ जैसे द्विअर्थी मुहावरों से पुरुषों को चिढ़ाना ही कुछ कथित बौद्धिक महिलाओं के लिए ‘क्रांति’ बन गया है। इस तथाकथित यौन-आजादी और बेबाकी के फेर में वे यह भूल जाती हैं कि पितृसत्ता का विरोध करने और खुद एक उपभोग की वस्तु (Object) की तरह दिखने में एक बहुत बारीक रेखा होती है।
यहाँ समानता ‘सुविधाजनक’ हो जाती है—जहाँ देह और निजी इच्छाओं के प्रदर्शन पर तो पहला हक चाहिए, लेकिन जिम्मेदारी के वक्त ‘महिला कार्ड’ खेल दिया जाता है। इस भटकाव का सबसे चिंताजनक पहलू यही है कि पुरुष समुदाय को सामूहिक रूप से केवल कामुक शोषक मानकर उनके खिलाफ ज़हर उगलना ही अब ‘कूल’ होने का पैमाना बन गया है। इससे भी बढ़कर, सुरक्षा के लिए बने प्रगतिशील कानूनों का व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए झूठा इस्तेमाल वास्तविक पीड़ित महिलाओं के संघर्ष को कमजोर करता है।

सच्चा नारीवाद समाज
“सच्चा नारीवाद समाज में विभाजन की लकीरें नहीं खींचता, बल्कि एक स्वस्थ सह-अस्तित्व की ज़मीन तैयार करता है। वह पुरुषों को अपना जन्मजात दुश्मन नहीं, बल्कि व्यवस्था में बदलाव का सबसे बड़ा सहयात्री मानता है। यदि हमें वाकई एक न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज बनाना है, तो सशक्तिकरण के नाम पर परोसी जा रही इस सतही उद्दंडता, दैहिक नुमाइश और सड़े हुए पुरुष-द्वेष को सिरे से खारिज करना होगा।
इंटरनेट के बंद कमरों से निकलने वाले इस ‘टॉक्सिक फेमिनिज्म’ के शोर को अब चुप होना ही होगा, ताकि चूल्हे से लेकर चौखट और कॉर्पोरेट तक लड़ रही वास्तविक पीड़ित महिलाओं की गूँज को दबाया न जा सके। मुखौटों को उतारना ही होगा, क्योंकि समाज की तरक्की किसी लिंग विशेष के वर्चस्व से नहीं, बल्कि दोनों के आपसी सम्मान और संतुलन से तय होती है।”
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